Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 195, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 195, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 195 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
तब कब और किस उपाय से वह अध्यात्म-व्यसन का त्याग करती है ? इस प्रश्न पर कहते है ।
तत्त्वज्ञानवश बाध होने के कारण सकल पदार्थो की निवृत्ति होने से ही स्वयं अक्षयस्वरूप क्षयशील
(विनाशी) देहादि के तादात्मअध्यास से उन्मुक्त होता है । इस प्रकार का वह स्वरूप ही सकल विक्षेपो
के विनाश से समाधान ओर निर्वृत्ति (सुख) रूप होने से निर्वाण कहलाता है