Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 195, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 195, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 195 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्, सब जीवों की सब मनोवृत्तियों मे जब जव जिस जिस भोग के
लिए जिस प्रकार स्वप्रकाश चिदात्मा का भान होता हे यानी विवर्त होता है उस प्रकार स्वयं ही भोक्ता
नाना जीवों के रूप से अनुभव करता हे यानी द्रष्टा, दृश्य और दर्शनरूप त्रिपुटी बनकर अपनी माया से
विवर्तत होता है
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ तिरानबेवाँ सर्ग समाप्त एक सौ चौरानबेवाँ सर्ग मोक्षसाधन आत्मतत्त्व ओर जगततत््व जिस भाँति रामचन्द्रजी ने जाना, उसका गुरुजी के समीप निवेदन ।