Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 195, Verses 35–36
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 195, verses 35–36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 195 · श्लोक 35,36
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
जो वैराग्य और बोध पूर्ण होने पर भी परस्पर से वर्धित न हों वे असत्य ही हैँ ।
चित्रलिखित अग्नि की भाँति स्वकार्य में अक्षम ही हैँ । वे नष्ट हैं (लुप्त हैं) ऐसा नहीं समझना चाहिये ।
बोध ओर वैतृष्ण्य की निरतिशयसम्पत्ति ही निरतिशय आनन्दरूप होने ओर आत्यन्तिक दुःखनिवृत्तिरूप
होने से भी मोक्ष कही जाती है,क्योकि अज्ञान ही बन्धनमूल है ओर तृष्णा ही बन्धन है उन दोनों का
विनाश ही मोक्ष है । मोक्षरूप अनन्त शान्त पद में स्थित पुरुष को शोक नहीं होता