Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 195, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 195, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 195 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
अध्यास परम्पराओं की समाप्ति से ही स्वयं अपना परमपुरुषार्थ अवशिष्ट रहता है, यह कैसे
संभव है ? क्योकि बुद्धि से जिसका अनुभव हो रहा हो वही पुरुषार्थ है । बुद्धि से जो अननुभूयमान
है उसमें पुरुषार्थता नहीं देखी जाती है । इसलिए पुरुषार्थता की प्रयोजिका चरमसाक्षात्कारवृत्ति
मुक्ति मे परमआवश्यक है, इसलिए सर्व पदार्थो की निवृत्ति मुक्ति है, यह मानना ठीक नहीं है ऐसी
आशंका पर कहते है ।
परमपुरुषार्थरूप बोध परमात्मबुद्धि से यानी चरम साक्षात्कार वृत्ति से ज्ञात नहीं होता है, क्योकि
जड बुद्धि में बोधशक्ति नहीं हे ओर बोध बुद्धि का विषय नहीं हो सकता।
शंका : तब बोधशक्तिमान् परमात्मा का जैसे सोये हुए राजा का बन्दियों द्वारा बोध कराया जाता
है वैसे ही बुद्धि द्वारा बोध कराया जाय ।
समाधान : नहीं, बुद्धि द्वारा आत्मा का बोधन नहीं होता, क्योकि जैसे राजा को सोया हुआ जानकर
उसके बोधन के लिए बन्दीजन प्रवृत्त होते है वैसे बुद्धि को सोये हुए बोध का परिज्ञान ही नहीं होता ऐसी
परिस्थितिमें उसके बोधन के लिए वह कैसे प्रवृत्त होगी ?
शंका : तव बोध ही बोध को जाने।
समाधान : बोध भी बोध को नहीं जान पाता, क्योकि बोध स्वयं बोध्य (बोध-कर्म) कैसे हो सकता
है ? क्रिया से जन्य अतिशय का आधार कर्म हे । बोध में न तो क्रिया है और न क्रियाजन्य अतिशय की
आधारता का ही संभव हे । बोध निष्क्रिय, निर्विकार है