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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 175

एक सौ तिहत्तरवाँ सर्ग समाप्त एक सौ चौहत्तरवाँ सर्ग प्रबोध (जागरण) द्वारा स्वप्न के मार्जन की भाँति ज्ञान द्वारा दृश्य का परिमार्जन करने पर अवशिष्ट रहे एक चिदात्मा का वर्णन ।

20 verse-groups

  1. Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, चूँकि सृष्टि के आदि मेँ केवल चिति ही स्वप्न क…
  2. Verse 2सृष्टियाँ ब्रह्मरूपी सागर की तरंग हैं, उनमें संवित्‌ ही द्रव (जल) हे । अज्ञानिया मे प्रसि…
  3. Verse 3जैसे स्वप्न ओर सुषुप्ति केवल निद्रारूप ही हैं वैसे ही दृश्य और अदृश्य स्वरूप आकाश चिदाकाश…
  4. Verse 4जाग्रत्‌ में जैसे स्वप्ननगर है वैसे ही यथार्थतः परिज्ञात यह जगत्‌ है इसमें विवेकी पुरुष क…
  5. Verse 5जाग्रत्‌ में स्वप्ननगर का जैसे बाध हो जाता हे वैसे ही सृष्टि के आरम्भ में सृष्टिसंवित्‌ क…
  6. Verse 6जैसे विविध प्रकार की स्वप्ननगर वासनार्एँ स्वप्नकाल में सत्यरूप से प्रतीयमान होती हुई भी ज…
  7. Verse 7यदि किसी को शंका हो कि जगत्‌ के भ्रान्तिरूप होने से तत्त्वज्ञान द्वारा उसके मूलभूत अज्ञान…
  8. Verse 8वाचारम्भण श्रुति द्वारा प्रदर्शित न्याय से पर्यालोचना करने पर मृत्तिका, तन्तु आदि से अतिर…
  9. Verse 9जगत्‌ स्वप्नपर्वत की तरह अन्दर भ्रान्तिरूप ही हैं। इस विषय में प्रत्यक्ष हेतु भी है वह यह…
  10. Verse 10अतएव जगत्‌ के बाध के बिना निर्विकल्प समाधि पर्यन्त ध्यानमात्र से आत्मोद्धार माननेवाले योग…
  11. Verse 11उक्त का ही स्पष्टीकरण करते हैं। चेत्ययुक्त ध्यान संसार है और चेत्यरहित ध्यान पत्थर की ~ स…
  12. Verse 12योगियों के अभिमत समाधि के अभ्यास से आपका अभिमत मोक्ष क्यो प्राप्त नहीं होता 2 इस प्रश्न प…
  13. Verses 13–15इसलिए वादियो के अभिमत पक्षों मे मोक्षअभावरूप दोष से छुटकारा न मिलने के कारण जगत्‌ केवल श्…
  14. Verses 16–17जो यह सम्यक्‌ ज्ञान की एकमात्रचनता (सम्यकूज्ञानैकरसता) है वह ध्यान कहा गया हे । “यत्र नान…
  15. Verse 18तब मुक्ति का यथार्थ स्वरूप क्या है ? इस पर कहते हैं। हे श्रीरामजी, जिसमें दृश्य का अत्यन्…
  16. Verse 19सम्यक्‌ ज्ञान से वह परम निर्वाण कहा गया है, निर्वाण में यह यथास्थित सारा विश्व अत्यन्त प्…
  17. Verse 20उसमें न भेद है ओर न अभेद है, न कुछ है ओर किंचित्‌ है वह सब सद्‌ असद्‌ भावों की चरम सीमा क…
  18. Verse 21जिसमें दृश्य का अत्यन्त असंभव है, शुद्ध बोधोदयस्वरूप, सकल विक्षेपो से रहित परमशान्त निरति…
  19. Verse 22उसकी प्राप्ति में मोक्षोपाय नाम का यह ग्रन्थ ही उपाय है, ऐसा कहते है । उत्पन्नमति (बुद्धि…
  20. Verses 23–79मोक्षोपाय नामक इस ग्रन्थ का निरन्तर पारायण कर रहे पुरुष को विशुद्ध अध्यात्मशास्त्रजनित ज्…