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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 175, Verses 16–17

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 175, verses 16–17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 175 · श्लोक 16,17

संस्कृत श्लोक

स्वप्नेऽनुभूयते चैतत्स्वप्नो ह्यात्मैव भासते । नानाबोधमनानैव ब्रह्मैवामलमेव तत् ॥ १६ ॥ ब्रह्मैवात्मनि चिद्भावाज्जीवत्वमिव कल्पयत् । रूपमत्यजदेवाच्छं मनस्तामिव गच्छति ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

जो यह सम्यक्‌ ज्ञान की एकमात्रचनता (सम्यकूज्ञानैकरसता) है वह ध्यान कहा गया हे । “यत्र नान्यत्‌ पश्यति नान्यच्छरणोति नान्यद्‌ विजानाति स भूमा" इत्यादि श्रुतियाँ ओर तत्त्ववेत्ता जिसमें दृश्य का अत्यन्त असम्भव हो उस बोध को ही परमपद कहते हैं वह गौतम ओर कणाद आदि की सम्मत मुक्ति की तरह पत्थर के समान जड़ नहीं है, हिरण्यगर्भ सम्मत प्रकृति-प्रलय के तुल्य सुषुप्तोपम नहीं है, पातंजलों की सम्मत मुक्ति की तरह निर्विकल्पतामात्र नहीं है, पाशुपत, पांचरात्र आदि की सम्मत मुक्ति की तरह सविकल्पक नहीं है ओर बोद्ध की अभिमत मुक्ति की तरह असत्‌ (नैरात्म्यरूप शून्य) भी नहीं है