Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 175, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 175, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 175 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
सर्गादौ स्वप्नसवित्तिरूपं सर्वं विनानघ ।
न सर्गो न परो लोको दृश्यमानोऽपि सिद्ध्यति ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
सृष्टियाँ ब्रह्मरूपी सागर की तरंग हैं, उनमें
संवित् ही द्रव (जल) हे । अज्ञानिया मे प्रसिद्ध दुःखरूपी सृष्टि का बोध द्वारा परिमार्जन हो चुका | किन्तु
उसके अनन्तर भी जीवन्मुक्त पुरुषों के व्यवहार के लिए जो जगत् प्रसिद्ध है, वह आनन्द-सत्-चित्
स्वरूप होने से दूसरी ही सृष्टि है, उसमें द्वैत, एेक्य आदि असुखरूप किस निमित्त से होगा, यह अर्थ
है