Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 175, Verse 7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 175, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 175 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
चिद्व्योमात्मावभासस्य नभसः सर्गरूपिणी ।
कृता पृथ्व्यादिकलना मनोबुद्ध्यादिता तथा ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि किसी को शंका हो कि जगत् के भ्रान्तिरूप होने से तत्त्वज्ञान द्वारा उसके मूलभूत अज्ञान का
मूलोच्छेद होने पर वाध हो जायेगा । किन्तु प्रधान, परमाणु आदि अन्य कारणों द्वारा अन्य प्रकार से
उसकी उत्पत्तिवश भ्रान्तिता की कल्पना न करने पर वाध न होगा । इसलिए उससे दुःख होगा ही, इस
आशंका पर कहते हैं।
अन्यथा उपपादन करके यदि जगत् के कारण की कल्पना करते हो तो स्वप्न जगत् में प्रसिद्धतर
होने तथा “वाचारम्भणं विकारो नामधेयम्" इत्यादि विविध श्रुतियों द्वारा बोधित होने के कारण कारणान्तर
की कल्पना की अपेक्षा निकटतम इसकी भ्रान्तिमात्रता की ही कल्पना क्यो नहीं की जाय, यह भाव
है