Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 175, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 175, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 175 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
न च किंचन नामाङ्ग कचत्यच्छैव सा स्मृता ।
चिन्मात्रैकैककलनं ततमेवात्मनात्मनि ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्त का ही स्पष्टीकरण करते हैं।
चेत्ययुक्त ध्यान संसार है और चेत्यरहित ध्यान पत्थर की ~ सी स्थितिवाला है, इसलिए योगियों
की सम्मत निरानन्दरूप मोक्ष अवस्था में परिशेष रहनेवाला ज्ञान मोक्ष (पुरुषार्थरूप) नहीं है, क्योकि
पत्थर के तुल्य भान मोक्ष नहीं है, क्योकि वह तो बन्धनतुल्य ही है। इससे आत्मा की ज्ञानस्वभावता न
माननेवाले वैशेषिकादि के सम्मत मोक्ष का भी निराकरण हो गया