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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 139

एक सौ सैंतीसवाँ सर्ग समाप्त एक यो अड़तीसवाँ सर्ग॑ प्राणी के जीवका और मेरे जीवका संमेलन होनेपर मैंने दुगुना विश्व देखा और एकता होनेपर एक विश्व देखा, यों मुनि द्वारा वर्णन ।

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  1. Verses 1–20महामुनि ने कहा : इस प्रकार जाग्रत से लेकर तुरीयपर्यन्त अवस्थाओं का रहस्य विचार कर मैं उस…
  2. Verse 21जब इस प्रकार की सुषुप्ति होती है तब यह प्राण इन्द्रिय सहित चित्त को क्या करता है ? इस पर…
  3. Verse 22वह स्वार्थ मे आसक्त रहे, फिर भी उसे मन, इन्द्रिय आदि दूसरों का कार्य भी करना चाहिये, सो क…
  4. Verse 23प्राण चित्त को ग्रस कर अपने आधीन कर लेता है, ऐसा जो कहा, उसपर श्रीरामचन्द्रजी आशंका करते…
  5. Verse 24अधिष्ठानमात्र से पृथक्‌ करनेपर देह, प्राण आदि जगत्‌ का कुछ भी स्वरूप नहीं टिकता, उससे अपृ…
  6. Verse 25इसी प्रकार चित्त भी चेत्य पदार्थो से निरूपणीय है, अतः चेत्य पदार्थो का अभाव होनेपर चेत्यप…
  7. Verses 26–27ब्रह्म सवत्मिक है इस कारण यदि उसकी सत्ता से मन आदि का अस्तित्व कहिये, तो मन आदि सब वस्तुए…
  8. Verse 28हे राजकुमार श्रीरामजी, जैसे यह त्रिजगत्‌ ब्रह्म ही है और जैसे यह विविध रूप है इस विषय में…
  9. Verse 29पहले अधिष्ठान का निर्देश करते है । निर्मल, अनन्तआकाशस्वरूप, सनातन और सर्वस्वरूप चिन्मात्र…
  10. Verse 30सर्वज्ञ होने के कारण उक्त चिन्मात्र ने मानसिक पीड़ा से शून्य अपने शुद्ध बुद्ध स्वरूप का त…
  11. Verse 31मन से उसने जो अपने संचरण की कल्पना की, हे श्रेष्ठतम वेदज्ञ, उसे आप प्राणवायु जानिये
  12. Verse 32जैसे इस प्राणता को वह कल्पित सी जानता हे, वैसे ही इन्द्रिय, देह आदि ओर दिशा, काल आदि को भ…
  13. Verse 33इस प्रकार यह सारा का सारा विश्व चारों ओर केवल चित्त ही ठहरता है, उससे अतिरिक्त नहीं, चिदध…
  14. Verses 34–35निराकार, अनादि, अनन्त, निर्दोष शान्त सन्मात्र, चिन्मात्र ब्रह्म ही जगद्रूप स्थित है । चूँ…
  15. Verses 36–67संकल्पात्मक मन ही कार्य ब्रह्म है वह जैसे भू आदि लोकों की ओर अन्यान्य वस्तुओं की कल्पना क…