Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 139, Verses 1–20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 139, verses 1–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 139 · श्लोक 1-20
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
चित्तमेव जगत्कर्तृ संकल्पयति यद्यथा ।
असत्सत्सदसच्चैव तत्तथा तस्य तिष्ठति ॥ १ ॥
तेन संकल्पितः प्राणः प्राणो मे गतिरित्यपि ।
न भवामि विनानेन तेन तत्तत्परायणम् ॥ २ ॥
अहं कतिपयं कालं ननु प्राणविनाकृतः ।
न भवामि पुनर्नूनं भवाम्येवेति कल्पितम् ॥ ३ ॥
यत्र तेनाङ्गं तत्रैतत्प्राणेनाशु क्षणाद्वपुः ।
उदितं पश्यति मनो मायापुरमिवाततम् ॥ ४ ॥
न भवाम्येव भूयोऽहं प्राणदेहविनाकृतः ।
दृढनिश्चयभागित्थं चितो भवति नो पुनः ॥ ५ ॥
दोलायितं तु संदेहाद्दुःखमास्ते कुनिश्चयम् ।
विकल्पेनैवमस्यैतज्ज्ञानान्नाल्पेन यास्यति ॥ ६ ॥
यस्यायमहमित्यस्ति तस्य तन्नोपशाम्यति ।
वर्जयित्वात्मविज्ञानं केनचिन्नाम हेतुना ॥ ७ ॥
नान्यत्र प्रथते ज्ञानं मोक्षोपायविचारणात् ।
ऋते तस्मात्प्रयत्नेन मोक्षोपायो विचार्यताम् ॥ ८ ॥
किलाहमिदमित्येव नाविद्या विद्यते क्वचित् ।
मोक्षोपायादृते नैतत्कुतश्चिदयतेऽन्यतः ॥ ९ ॥
एवं यन्मनसाभ्यस्तमुपलब्धं तथैव तत् ।
तेन मे जीवितं प्राणा इति प्राणे मनः स्थितम् ॥ १० ॥
यदा स्वकर्मणि स्पन्दे व्यग्रः प्राणो भृशं भवेत् ।
तदा तदीहितव्यग्रः प्राणो नात्मोद्यमी भवेत् ॥ १२ ॥
एते हि प्राणमनसी त्वन्योन्यं रथसारथी ।
के नाम नानुवर्तन्ते रथसारथिनौ मिथः ॥ १३ ॥
इत्यादिसर्गे स्वात्मैव चेतितः परमात्मना ।
तेनैषाद्यापि नियतिर्नाबुधानां निवर्तते ॥ १४ ॥
देशकालक्रियाद्रव्यैर्मनःप्राणशरीरिणाम् ।
प्रयान्त्यधिगता देहेष्वरूढानां परे पदे ॥ १५ ॥
स्वं प्राणमनसी साम्यात्कुर्वती कर्म तिष्ठतः ।
वैषम्याद्विषमं चैकं शान्ते शान्ता सुषुप्तता ॥ १६ ॥
यदाहारादिरुद्धासु नाडीषु क्वापि पिण्डितः ।
शान्तमास्ते जडः प्राणस्तदोदेति सुषुप्तता ॥ १७ ॥
नाडीष्वन्नावपूर्णासु तथा क्षीणासु वा क्लमात् ।
निःस्पन्दस्तिष्ठति प्राणस्तदोदेति सुषुप्तता ॥ १८ ॥
नाडीनां मृदुरूपत्वात्पूर्णत्वाद्वा व्रणोदरे ।
क्वापि प्राणे स्थिते लीने निःस्पन्दास्ते सुषुप्तता ॥ १९ ॥
तापस उवाच ।
अथ यस्य प्रविष्टोऽहं हृदये सोऽभवन्निशि ।
सुषुप्तघननिद्रालुराहारपरितृप्तिमान् ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
महामुनि ने कहा : इस प्रकार जाग्रत से लेकर तुरीयपर्यन्त अवस्थाओं का रहस्य विचार कर मैं उस
प्राणी के चिदाभासरूप जीव के साथ एकीभाव को प्राप्त करने के लिए वैसे ही प्रवृत्त हुआ जैसे कि फूले
हुए आप्र -वृक्ष की सुगन्धि वायु द्वारा कमलों के तालाब में पहुँचकर वायुस्थित कमल की सुगन्ध के साथ
एकता को प्राप्त होने के लिए प्रवृत्त हो । मैंने उस प्राणी के चिदाभास में प्रवेश करने के लिए ज्योंही
पूर्वोक्त तेजधातु का (ओज का) परित्याग किया, त्योंही मेरी सकल इन्द्रियरूप संवित् बहिर्मुख व्यापार
में बलात् प्रवृत्त हो गई । तदुपरान्त बहिर्मुख व्यापार में प्रवृत्त हुई सकल इन्द्रियों का अन्तःव्यापार में
उन्मुख प्रयत्न से जवर्दस्ती निग्रह कर रहा मैं एक क्षण में वैसे ही भीतर भी फेल गया जैसे कि तैल बिन्दु
जल में फैलता हे । इस प्रकार उपाधि में व्याप्त होकर मैं ज्योंही उस प्राणी के चिदाभास संवित् में मिलने
से परिणत हुआ उसी समय उसकी वासना ओर मेरी वासना दोनों के अन्दर भासने से सारा भुवन मुझे
दुगुना दिखाई पड़ा । सब दिशाएँ दुगुनी हो गई, दो सूर्य तपने लगे, दो भूमण्डल बन गये ओर द्युलोक भी
दो हो गये, जैसे दर्पण के अन्दर प्रतिविम्बित मुख के दो प्रतिबिम्ब भासते हैं वैसे ही मिश्रित (मिले हुए)
वे भासे उससे जगत् द्विगुण हो गया। दो चेतनरूपी तिलो मे तेल की नाई विज्ञानकोश में जो भान होते
हैं उन संमिश्रित उपाधियों मे स्थित दो चिदाभासो में द्विगुणभूत तत्-तत् जगत् उस प्रकार मिश्रित
प्रतीत होता है । चिदाभास रूप दो जीवों के विज्ञानमय कोष में स्थित तथा मिश्रित होने पर भी वासनाओं
के मिश्रित न होने के कारण अमिश्रित वे दोनों जगत् दूध और जल के समान एक से प्रतीत हए । मैने
देखते ही उस प्राणी के चिदाभासरूप जीवको अपने जीवसे परिच्छिन्न कर दो उपाधियों में एकता के
स्थापन द्वारा वैसे ही अपने में मिला लिया जैसे कि दूसरी ऋतु पहले की ऋतु को अपने में मिला लेती हे,
जैसे बड़ी नदी छोटी नदी को आत्मसात् कर लेती है, जैसे वायु सुगन्धिको अपने में मिला लेता है और
जैसे मेघ धूप्रपंक्ति को अपने में मिला लेता हे । जैसे नेत्र में विकार होने से दुर्दृष्टिवश दो स्वरूपो में
दिखाई देनेवाला चन्द्रमा विकार की निवृत्ति होने से सुदृष्टिवश एक हो जाता है वैसे ही पहले वासनाओं
के अमिश्रणवश जो जगत् मुझे द्विगुण दिखाई पडता था वासनाओं के भी मिश्रण द्वारा एकीकरण से
संवित् के अत्यन्त अभिन्न (एक) होनेपर वह भी आज एकता को प्राप्त हो गया । उसके पश्चात् जव कि
मैं उस प्राणी के चिदाभास में स्थित हो चुका था ओर अपना निजका पूर्वापर विचार भी मैंने छोड़ा न था,
उस अवस्था में उस प्राणी की संकल्पानुसारिणी स्थिति को पहुँचा हुआ मेरा संकल्प स्वल्प हो गया
यानी घटते घटते नाममात्र रह गया । उसके अनन्तर वहाँपर उस प्राणी की चित्तवृत्ति से ही उसके भोग्य
शब्द आदि विषयों का अवलोकन कर रहे मेने उसके हृदय का परित्याग न करते हुए उस प्राणी के
जाग्रद्व्यवहाररूप दिनचर्या का अनुभव किया | तदनन्तर सायंकाल के समय जैसे कमल संकोच को
प्राप्त होता है वैसे ही वह प्राणी अन्न खाकर, जल पीकर तथा दिन के कार्यो से थककर स्वेच्छासे ही
धीरे धीरे निद्रादेवी की गोद में चला गया । निद्रा के आरम्भ में उसके प्राण ने बाहर दसों दिशाओं में फैले
हुए रूपादि विषयों के दर्शन में संलग्न अपने चित्त को जैसे सूर्य सायंकाल के समय अपनी आभा को
बटोर लेते हैँ वैसे ही बटोर लिया | उसके बाद चित्त के साथ सम्पूर्ण चित्तवृत्तियाँ संकंचित होकर कछुए
के अंगों की नाई हृदयकोश मे प्रविष्ट हो गई । चक्षु आदि इन्द्रियाँ संकोच को प्राप्त होकर हृदयपद्याकार
हो गई । मृत्यु होनेपर पथराई हुई-सी वे चित्रलिखित की तरह व्यापारशून्य हो गई । उसमें स्थित मैं
उसके चित्त का अनुगामी था, अतएव उसकी चित्तवृत्ति के साथ ही उसकी इन्द्रियों का सहसा त्यागकर
उसकी नाड़ियों के द्वारा उसके हृदय में प्रविष्ट हो गया । बाहरी अनुभव को हटाकर भीतर ही शय्या के
समान कोमल उसके ओज में (पूर्वोक्त तेज के अन्दर स्थित आनन्दमय कोश मेँ) शून्यरूप सुषुप्ति का
मैंने क्षणभर अनुभव किया। उस समय समान नाम का वायु छिद्रयुक्त अत्यन्त घनी नाडयो मे श्रान्ति
से तथा बहुत से अन्नजलरस के विकारों से यत्र तत्र रुकावट पड़ने से बाहर तो निकलता ही नहीं, फिर
भी अतिमन्द गति से संचार करता हे
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ सैंतीसवाँ सर्ग समाप्त एक यो अड़तीसवाँ सर्ग॑ प्राणी के जीवका और मेरे जीवका संमेलन होनेपर मैंने दुगुना विश्व देखा और एकता होनेपर एक विश्व देखा, यों मुनि द्वारा वर्णन ।