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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 139, Verse 24

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 139, verse 24 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 139 · श्लोक 24

संस्कृत श्लोक

तच्च क्षुब्धार्णवोत्थेन पूर्यमाणं महाम्भसा । विमुक्तेनेव कल्पाभ्रैरभ्रंकषतरंगिणा ॥ २४ ॥

हिन्दी अर्थ

अधिष्ठानमात्र से पृथक्‌ करनेपर देह, प्राण आदि जगत्‌ का कुछ भी स्वरूप नहीं टिकता, उससे अपृथक्‌ करनेपर तो उसकी सत्ता से सब कुछ है ही । ऐसी स्थिति में प्राण से पृथकृकृत अकेले मन का अस्तित्व नहीं है, ऐसी आपने जो शंका की, वह छोटी शंका है, इस आशय से श्रीवसिष्ठजी उत्तर देते हैं । स्वानुभूत भी यह अपना शरीर वास्तव में है ही नहीं, क्योकि जैसे स्वप्न में मन अपने अन्दर ही पर्वत की कल्पना करता है वैसे ही यह शरीर भी मन की कोरी कल्पना है । इसलिए मन से पृथकृकृत शरीर का अस्तित्व नहीं