Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 139, Verse 21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 139, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 139 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
तेन सार्धमहं तत्र तच्चित्तेनैकतां गतः ।
सुषुप्तनिद्रां सुघनां गुणीभूतोऽनुभूतवान् ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
जब इस प्रकार की सुषुप्ति होती है तब यह प्राण इन्द्रिय सहित चित्त को क्या करता है ? इस पर
कहते हैं।
जब इस प्रकार की सुषुप्ति होती है तब प्राण प्राणरूप अद्वितीय संप्रसन्न जो आत्मा केवल उसमें
परायण होकर पुरीतत् नाडी में प्रवेशकर अपने साथ स्थित चित्त को ग्रसकर अपने आधीन कर लेता है,
क्योंकि प्रत्यगात्मरूप परमार्थ या पुरुषार्थ का ऐसा ही स्वभाव है । उक्त स्वभाववश परिशेषरूप
सुखविश्रान्ति मेँ वह आसक्त रहता है, यह भाव है