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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 139, Verse 23

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 139, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 139 · श्लोक 23

संस्कृत श्लोक

सुषुप्ते तनुतां याते हृदयादिव निर्गतम् । अपश्यमहमत्रैव भुवनं भास्करादिमत् ॥ २३ ॥

हिन्दी अर्थ

प्राण चित्त को ग्रस कर अपने आधीन कर लेता है, ऐसा जो कहा, उसपर श्रीरामचन्द्रजी आशंका करते है । श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे महामुने, मन इस समय में भी प्राणव श ही मनन आदि व्यापार करता हे । यदि प्राण द्वारा स्वायत्तीकृत होकर मनन आदि व्यापार नहीं करता है तो इस समय में भी क्यों नहीं करता, क्योकि प्राण से पृथक्‌ किये हुए मन का कुछ स्वरूप नहीं है, इसलिए प्राणविनिर्मुक्त मन क्या है ? यानी कुछ नहीं है