Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 139, Verses 34–35
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 139, verses 34–35 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 139 · श्लोक 34,35
संस्कृत श्लोक
चतुर्धा भित्तिभेदेन वृद्धबालाङ्गनान्वितम् ।
जगाम शतधा वीच्यां शिलायामिव निर्झरः ॥ ३४ ॥
उह्यमानोऽहमभवं ततः प्रलयवारिणि ।
त्यक्तसर्वकलत्रादिचित्तः प्राणपरायणः ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
निराकार, अनादि, अनन्त, निर्दोष शान्त सन्मात्र, चिन्मात्र ब्रह्म
ही जगद्रूप स्थित है । चूँकि ब्रह्म सर्वशक्ति है, अतः वह प्राथमिक मनःशक्ति से पूर्वसिद्ध अपने
स्वरूप का ही यत्र तत्र जाग्रत या स्वप्न में जगत् के रूप से अनुभव करता हे