Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 110
एक सौ आठवाँ सर्ग समाप्त एक सौ नोवाँ सर्ग मन्त्ियों की सलाह से राजा का अपने शरीर का होम करना, तदुपरान्त अग्नि से चार शरीरों से युक्त राजा का प्रकट होना ।
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- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे मुनिगण जिसके भूलोक और अन्तरिक्षलोक पर दैत्…
- Verse 2मन्त्रियों ने कहा : महाराज, हमने सब विचार कर निश्चय कर लिया है । शत्रु साम, दाम ओर भेद- इ…
- Verse 3महाराज, दान, सम्मान आदि से स्नेह ओर अनुप्रवेश (अपने पक्षवालों का ही शरणागति के बहाने काको…
- Verse 4जिन पर थोड़ा बहुत विश्वास किया जा सके और जिनको द्रव्य की कमी हो उन पर साम, दान आदि उपायों…
- Verse 5इसलिए इनके विषय में साम-दान का प्रयोग करना अत्यन्त सुसाहस है (अविचारित कार्य है) इसका परि…
- Verse 6वीरों को युद्ध के लिए आज्ञा दीजिये, इष्ट देवताओं का जप-पूजन आदि अनुष्ठान कीजिये, सामन्तं…
- Verse 7सब योद्धाओं को कवच आदि से सुसज्जित कीजिये युद्ध का बाना पहनाइये, तदुपरान्त वे सबके-सब युद…
- Verses 8–9धनुष खूब (कानों तक) ताने जाय, प्रत्यंचाएँ टंकार करें, अर्धमण्डलाकार धनुषों से दिशाएँ मेघश…
- Verse 10राजा ने कहा : संग्राम के लिए शीघ्र प्रस्थान कीजिये । नगर रक्षा, व्यूहरचना आदि की व्यवस्था…
- Verse 11ऐसा कहकर आवश्यक अन्यान्य कार्यों के रहते भी (अत्यावश्यक अन्यान्य कार्यों को छोड़कर भी) रा…
- Verse 12स्नान करने के उपरान्त राजा ने अग्निगृह में प्रवेश किया और विधिपूर्वक श्रद्धा से अग्नि की…
- Verses 13–14मैंने अनायास विलासवैभवपूर्ण सम्पत्ति से आयु व्यतीत की, समुद्रपर्यनत शासनमुद्रापूर्वकत अपन…
- Verse 15प्रजा के चित्तरूपी चन्द्रबिम्बों में अपना शुभ्र यश भर दिया, भूमि में तीनों लोकों में फैलन…
- Verse 16सुहृद, मित्र, पूज्य ब्राह्मण (गुरुवर्ग) और बन्धुबांधवों को विविध रत्नों से खजाने के समान…
- Verse 17शत्रुओं के प्राणों को मेढक की गर्दन की त्वचा के समान खूब कपा डाला, द्वीप द्वीपान्तर के कु…
- Verse 18दिगन्तं मे प्रसिद्ध सिद्ध सेनाओं से पूर्ण अपूर्व सुवर्णं भूमियों में मेने खूब विहार किया,…
- Verse 19जैसे ज्ञानपूर्णं एकान्त में समाधि लेनेवाली बुद्धि से परमोच्च ब्रह्म में विश्राम लिया जाता…
- Verses 20–26उद्धत (विनयरहित) लंका आदि द्वीपों में रहनेवाले राक्षसों को भी मजबूत हथकड़ियों द्वारा भने…
- Verse 27हे विभो, उन शरीरों से मैं चारों दिशाओं में अपने शत्रुओं का बिना किसी बिघ्नबाधा के संहार क…
- Verse 28श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामचन्द्रजी, यह कहकर उस राजा ने जैसे बालक अनायास चंचल कमल को तो…
- Verse 29ज्योंही वह राजा अपने कटे सिर का अग्नि में हवन करने लगा त्योंही शरीर के साथ अग्नि में गिर…
- Verse 30उस शरीर को खाकर (आहुति रूप से गहणकर) अग्नि ने उसे चतुर्गुण शरीर दिया । महान् लोगों द्वार…
- Verse 31इसके पश्चात् चार मूर्ति धारणकर राजा तेज की राशियों से देदीप्यमान हो अग्निकुण्ड से ऐसे ही…
- Verses 32–34दीप्तकान्तिवाले उसके वे चार शरीर अत्यन्त सुशोभित हुए, उनके माला, आभूषण, अस्त्र-शस्त्र और…
- Verses 35–36उनके सोने के बाणों से भरे तरकस बंधे थे, एकसी प्रत्यंचावाले उनके धनुष थे, सुन्दर समान शरीर…
- Verse 37वे चार देह क्या थे चार सागर ही थे । मानों बडवाग्नि ने पहले पीकर चिर कालतक उन्हें अपने गर्…
- Verses 38–47रत्नों से विभूषित ओर रत्नभूत अश्वशरीरों में पुष्पराशियों से पूण्दिहवाले चन्द्ररूपी अपनी म…