Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 110, Verses 32–34
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 110, verses 32–34 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 110 · श्लोक 32-34
संस्कृत श्लोक
पटनद्धपताकौघजातसंचारिदोर्द्रुमम् ।
रक्तोज्ज्वलत्वात्त्रैलोक्यलक्ष्म्या भूषणविद्रुमम् ॥ ३२ ॥
मन्दराहननोद्भूतक्षीरोदजलसुन्दरैः ।
छत्रैश्छादितहेत्योघपुष्पाढ्यगगनाङ्गनम् ॥ ३३ ॥
गणगीर्वाणगन्धर्वगीतशूराशयं कृतम् ।
तद्भातरलतालाग्रहेतिहालाहलायुधम् ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
दीप्तकान्तिवाले उसके वे चार शरीर अत्यन्त सुशोभित हुए, उनके माला,
आभूषण, अस्त्र-शस्त्र और वस्त्र साथ ही उत्पन्न हुए थे और कवच, शिरस्त्राण भी साथ ही
पैदा हुए थे । वे मुकुट, कंकण, बाजूबंद से युक्त थे, हार और कुण्डलों की कान्ति से जगमगा
रहे थे । वे सब सबकी रक्षा करनेवाले तथा महान् आशयवाले थे । सबकी रूपरेखा एकसी
थी ओर सब एक से अंग-प्रत्यंग से युक्त थे, सबके सब चंचल उच्चैश्रवा के सदुश उत्तम घोड़ों
पर चढ़े थे