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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 110, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 110, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 110 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । पुरोपकण्ठसंप्राप्तैश्चतुर्दिक्कं सहारिभिः । एतस्मिन्नन्तरे तत्र प्रवृत्तं दारुणं रणम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे मुनिगण जिसके भूलोक और अन्तरिक्षलोक पर दैत्य आक्रमण कर चुके हो वैसे इन्द्र के समीप आते हैं वैसे ही सब मन्त्री राजा के समीप आये

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ आठवाँ सर्ग समाप्त एक सौ नोवाँ सर्ग मन्त्ियों की सलाह से राजा का अपने शरीर का होम करना, तदुपरान्त अग्नि से चार शरीरों से युक्त राजा का प्रकट होना ।