Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 110, Verses 13–14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 110, verses 13–14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 110 · श्लोक 13,14
संस्कृत श्लोक
दन्तिदन्तगुणोद्गीर्णैर्हेतिपाषाणघर्षणैः ।
तारक्रेंकारहुंकारैराहूतसुरवारणम् ॥ १३ ॥
वहच्छरनदीपूरपूर्णाम्बरमहार्णवम् ।
विचलच्चक्रकुन्तासिधारामकरकर्कशम् ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
मैंने
अनायास विलासवैभवपूर्ण सम्पत्ति से आयु व्यतीत की, समुद्रपर्यनत शासनमुद्रापूर्वकत अपनी
सारी प्रजा को अभयप्रदान किया । पृथ्वी पर आक्रमण करनेवाले शत्रुओं को चरणों पर नवा
डाला । जैसे लताएँ फलों के बोझ से नत हो जाती हैं वैसे ही कर आदि फल के भार से दसों
दिशाओं को मैंन नवा दिया