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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 110, Verses 35–36

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 110, verses 35–36 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 110 · श्लोक 35,36

संस्कृत श्लोक

संघप्रहरणासंख्ययातुधानाझणज्झणम् । भुक्त्वा चाद्रिगुहागेहपूरितापूर्वदुर्द्रुमम् ॥ ३५ ॥ कचत्कुन्तवनव्यस्तशिरःकरवृताम्बरम् । क्षेपणोन्मुक्तपाषाणपूरप्लुतककुब्लतम् ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

उनके सोने के बाणों से भरे तरकस बंधे थे, एकसी प्रत्यंचावाले उनके धनुष थे, सुन्दर समान शरीरवाले महामना वे मंगलमय पुरुष जिस पुरुष, हाथी, रथ ओर घोडे-पर सवार होते थे, वह शत्रुप्रयुक्त मन्त्र, तन्त्र, औषधि, यन्त्र, श्त्रास्त्र आदि दोषों का लक्ष्य ही नहीं हो सकता था