Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 110, Verse 4
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 110, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 110 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
अग्निदाहमहातापप्रतपत्पर्णकाननम् ।
लोलालातलताशलमुसलोपलपूर्णखम् ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
जिन पर थोड़ा बहुत विश्वास किया जा सके और जिनको द्रव्य की कमी हो उन पर साम, दान
आदि उपायों की गुंजायश हैं, किन्तु ये श्र तो ऐसे नहीं है, ऐसा कहते हैं /
पापी, सीमाप्रान्त के निवासी, प्रचुरधनसम्पन्न, विविधदेशीय, सुसंगठित, हमारी कमजोरी
को जाननेवाले बहुत से शत्रु साम, दान उपायों के योग्य नहीं हैं