Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 95
17 verse-groups
- Verse 1होता है, वह यदि भ्रमरूप है, तो वह अर्थक्रियासमर्थ ओर दुःख का कारण कैसे हे, भ्रमात्मक वस्त…
- Verse 2सत्यसंकल्पभावना से दृढ़ किया गया मिथ्याभूत अर्थ-क्रियासमर्थ और दुःख का उत्पादक होता है, य…
- Verse 3यही कारण है कि ज्ञानाभ्यास के परिपाक क्रम से मूलअज्ञान का शैथिल्य हो जानेपर जगत् की क्रम…
- Verse 4अज्ञान को शिथिल बना देने में एकमात्र कारण है-इद्धियनिरोध के अभ्यास से बाह्मवृत्तियों का श…
- Verse 5लोक में भी अपक्षयपूर्वक ही स्थूल भावों का विनाश प्रसिद्ध है, यह कहते है । व्यवहार में भी…
- Verse 6दर्शित रीति से क्रमशः अज्ञान की शिथिलता द्वारा जगत् का वाध हो जाने पर ही अपने नित्यसिद्ध…
- Verse 7शंका के बाद उपसंहार कर प्रस्तुत विषय का निगमन करते हुए कहते हैं। वास्तव में जो सृष्टि बना…
- Verse 8उसका फल दिखलाते हैं। हे भद्र, यह जो भूत-सृष्टि दिखाई पड़ती है, वह मृगतृष्णाजल के सदृश मिथ…
- Verse 9यही कारण है कि जगत् का स्वरूप भ्रान्ति ही है, दूसरा नहीं - यह कहते हैं। कारण का अस्तित्व…
- Verse 10इसलिए विचार द्वारा मिथ्यारूप से देखा गया पदार्थ अर्थक्रिया के साथ स्वरूप से भी वंचित हो ज…
- Verse 11तब तो पितामह के प्रति निर्विशेष ब्रह्म ही कारण क्यो नहीं होता ? यदि कहो कि परिणामी होने प…
- Verse 12श्रति, युक्ति ओर अनुभव का विरोध होने से हिरण्यगर्भ का कारण निर्विशेष ब्रह्म नहीं हो सकता,…
- Verses 13–14अन्य कारकों की अप्रसिदि होने से उनको लेकर इसमें स्वातन्त्रयरूप अकर्तृत्व भी नहीं आ सकता,…
- Verse 15इसी रीति से जीवरूपता की भ्रान्ति के कारण उसमें प्राप्त हुए कर्तृत्व-भोक्तृत्व का भी निरास…
- Verses 16–19निष्कर्ष बतलाते हैं। इसलिए यह जगत् न किसीसे कुछ किया गया है और न इसकी सत्ता ही है। परिपू…
- Verses 20–23उपदिष्ट अर्थ का अपने अनुभव से अनुमोदन कर रहे राजा - युक्क्तिपूर्वक आपने उपदेश दिया - यों…
- Verses 24–25उसी स्थिति का अभिनयपूर्वक उपसंहार करते हैं। अत्यन्त आश्चर्य है कि, देश, काल, कला एवं क्रि…