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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 95, Verse 15

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 95, verse 15 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 95 · श्लोक 15

संस्कृत श्लोक

अप्रतर्क्यमविज्ञेयं यच्छिवं शान्तमव्ययम् । तत्कथं कस्य केनैव कर्तृ भोक्तृ कदा भवेत् ॥ १५ ॥

हिन्दी अर्थ

इसी रीति से जीवरूपता की भ्रान्ति के कारण उसमें प्राप्त हुए कर्तृत्व-भोक्तृत्व का भी निरास करना चाहिए, यह कहते हैं। जो अतर्क्य, अविज्ञेय, शान्त, विकारशून्य ओर कल्याणरूप है उसमें कर्तुत्व ओर भोक्तृत्व किस तरह, किसका, किससे ओर किस समय होगा ? बतलाइये