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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 95, Verse 9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 95, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 95 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

कारणाभावतः कार्यमभूत्वा भवतीति यत् । मिथ्याज्ञानादृते तस्य न रूपमुपपद्यते ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

यही कारण है कि जगत्‌ का स्वरूप भ्रान्ति ही है, दूसरा नहीं - यह कहते हैं। कारण का अस्तित्व न होने से कार्य की सत्ता हो ही नहीं सकती, असत्‌ कारण से असत्‌ कार्य की जो उत्पत्ति होती देखी जाती है, उसका स्वरूप मिथ्याज्ञान के सिवा और कोई दूसरा हो ही नहीं सकता