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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 95, Verse 6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 95, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 95 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

अनेनैव क्रमेणैवं त्वमादिपुरुषो नृपः । भ्रमाकारोदयं विद्धि मृगतृष्णाम्बुवत्स्थितम् ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

दर्शित रीति से क्रमशः अज्ञान की शिथिलता द्वारा जगत्‌ का वाध हो जाने पर ही अपने नित्यसिद्ध पूर्णतारूप पुरुषस्वभाव में प्रतिष्ठा हो जाती है, यह कहते है। हे राजन्‌, इसी अज्ञाननाशक्रम से ही पूर्णतास्वभाववाले आप आदि पुरुष हैं। अतः यह सारा प्रपंच मृगतृष्णाजल की नाई केवल भ्रम के स्वरूप में उदित होकर अवस्थित है, यह आप जानिए