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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 95, Verses 16–19

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 95, verses 16–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 95 · श्लोक 16-19

संस्कृत श्लोक

अतो नेदं कृतं किंचिज्जगदादि न विद्यते । न कर्तासि न भोक्तासि सर्वं शान्तमजं शिवम् ॥ १६ ॥ कारणाभावतः कार्यं न कस्यचिदिदं जगत् । अकारणत्वात्कार्यत्वं भ्रमाद्विद्धि त्विदं जगत् ॥ १७ ॥ अकार्यत्वाच्च नास्त्येतत्सर्ग इत्थं न विद्यते । यदा न कस्यचित्कार्यं कारणस्य जगत्तदा ॥ १८ ॥ पदार्थाभावसंसिद्धिस्तत्सिद्धौ कस्य वेदनम् । एवं तु वेदनाभावे नास्त्यहंत्वस्य कारणम् ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

निष्कर्ष बतलाते हैं। इसलिए यह जगत्‌ न किसीसे कुछ किया गया है और न इसकी सत्ता ही है। परिपूर्णस्वभाववाले आप न कर्ता हैं और न भोक्ता हैं । जहाँ हाथ डालिए वहाँ आपको सब कुछ शान्त अजन्मा, आनन्दात्मक केवल ब्रह्म ही ब्रह्म है, यह मिलेगा | कारण की सत्ता ही नहीं है, इसलिए यह जगत्‌ किसीका भी कार्य नहीं हे । कारण का स्वरूप न रहने से जो कार्यस्वरूप दिखायी देता है वह केवल भ्रम से ही, इसलिए यह जगत्‌ भ्रमात्मक ही है, यह जानिये । किसीका कार्य न होने से यह सारी सृष्टि तीनों काल में असत्‌ है । इस रीति से यह जगत्‌ जब किसी भी कार्य का कारण नहीं है तब अनायास समस्त पदार्थों की असत्ता सिद्ध हो जाती है । पदार्थों की असत्ता सिद्ध हो जाने पर फिर ज्ञान किसका और इस रीति से जब ज्ञान का ही अभाव सिद्ध हो गया तब अहंकार का कोई कारण ही नहीं रहता। इस रीति से अहम्भाव का निरास करने के लिए उपाय बतलाकर अन्त में अवशिष्ट हुए आत्मतत्त्व का अनुभव कराते हैं । इसलिए हे राजन्‌, आप सर्वविध मलों से निर्मुक्त परममुक्त ही हैं। बन्ध और मोक्ष की कथा से आपको प्रयोजन ही कौन है