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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 95, Verses 24–25

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 95, verses 24–25 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 95 · श्लोक 24,25

संस्कृत श्लोक

जगत्पदार्थप्रविभागदृष्टिः सदेशदिक्कालकलाक्रियौघा । अहो तु कालेन चिरेण शान्ता ब्रह्मैव शान्तं स्थितमव्ययात्म ॥ २४ ॥ शाम्यामि निर्वामि परिस्थितोऽस्मि न यामि नोदेमि न चास्तमेमि । तिष्ठामि तिष्ठ स्वयथास्थितात्मा शिवं शुभं पावनमौनमस्मि ॥ २५ ॥

हिन्दी अर्थ

उसी स्थिति का अभिनयपूर्वक उपसंहार करते हैं। अत्यन्त आश्चर्य है कि, देश, काल, कला एवं क्रियाओं से युक्त यह जो जगत्‌ के पदार्थों की विभक्त दृष्टि थी वह दीर्घकाल के अनन्तर शान्त हो गई । अब विकारशून्य केवल ब्रह्म ही बच गया। अब मैं शान्ति का अनुभव करता हूँ, मुक्त हो गया हूँ, सब ओर से पूर्ण स्वभाव होकर स्थित हूँ, न जाता हूँ, न उदित होता हूँ और न अस्त होता हूँ। हे भगवन्‌, मैं जैसे इस रूप में हूँ वैसे आप भी चिदेकरस यथास्थित आत्मस्वरूप होकर स्थित हो जाइये, क्योंकि उस प्रकार की स्थिति में आपका स्वरूप बनकर मैं परम पुरुषार्थरूप शुद्ध वाणी से अगम्य निरतिशय सुख ही बनकर विराजित हूँ