Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 92
इक्यानवेरवौँ सर्ग समाप्त बानबेवाँ सर्ग कुम्भरूपिणी चूडाला की ऐसी बातें सुनकर सर्वत्याग में तत्पर हुए उस राजा ने वन आदि का त्याग कर तपस्या में उपयोगी अपने सम्पूर्ण पापों को अग्नि में क दिया-यह वर्णन ।
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- Verse 1“जब आप जंगल को चले, उसी समय मूच्छित होकर गिरे हुए अज्ञान को आपने जान से नहीं मारा” यह जो…
- Verse 2इसलिए नहीं किया कि वह अतत्ववित् ओर मिथ्यावादिनी थी, इस शंका का वारण करते है । हे राजन्,…
- Verse 3आत्मबुद्धबा चिरं जीवेद् गुखुबुद्धया विशेषतः । पर बुद्धिर्विनाशाय स्त्रीबुद्धिः प्रलयंकरी…
- Verse 4सिद्धः सर्वपरित्यागः साधो संसाध्यतस्तव । खर्वीकृतजगदृभूतिर्विद्यास्वात्मोदयस्तथा ॥ (हे सा…
- Verse 5केवलं सर्वत्यागे शेषिताहमतिस्त्वया” (आपने सर्वत्याग में केवल अभिमानरूप अविद्या को उस तरह…
- Verse 6अहंकार में तादात्म्य से आत्मा ही राज्यादि सबका स्वामी बन बैठा है, यदि आप यह कहें, तब तो ए…
- Verses 7–12कथित आशय को न जानकर राजा शिखिध्वज चूडाला का यह आशय समझ रहे हैं कि मैने पहले राज्य आदि का…
- Verse 13यद्यपि त्याग करने क कारण वन आदि आपके सव हैं नहीं, यह मैं मानता हूँ, तथापि आश्रम का अस्तित…
- Verses 14–20महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, ऐसा कहते हुए कुम्भवाक्य से प्रबोधित जितेन्द्रिय वी…
- Verses 21–25अपने आसन पर स्थित वह कुम्भ ऋषि मुसकुराता हुआ राजा शिखिध्वज की सारी क्रियाँ उस तरह देख रहा…
- Verses 26–27अव अक्षमाला छोड़ने की इच्छा से किये गये उपकार को भूल जाना जो एक दोष है उसका परिहार कर रहे…
- Verse 28हे सखि, मेने अनेक धर्मस्थान देख लिये, अब विश्राम ले रहा हूँ - यह कहकर राजा शिखिध्वज ने अक…
- Verses 29–31हे मृगचर्म, मनुष्यरूपी मृग मैने जंगली मृग से प्राप्त हुए तुम्हें बहुत दिनों तक अपने अज्ञा…
- Verses 32–37अव कमण्डलु छोड़ने की इच्छा कर रहे राजा शिखिध्वज अपनी कृतज्ञता प्रकाशित करने के लिए उसकी प…
- Verses 38–39हे साधो, जो वस्तु त्याज्य है उसका सदा शीघ्र त्याग कर देना चाहिए, क्योकि विद्यमान उन सभी व…
- Verses 40–41हे साधो कुम्भ, मैं निष्क्रिय होने के लिए क्रियोपयोगी सभी वस्तुओं को छोड रहा हूँ, इसलिए मे…