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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 92, Verses 14–20

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 92, verses 14–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 14-20

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । इति राम वदन्नेव कुम्भवाक्यप्रबोधितः । निमेषध्यानमात्रेण वशी वीरः शिखिध्वजः ॥ १४ ॥ प्रममार्जाश्रमास्थां तां संविदा शुद्धया हृदि । स्फुरन्तीं स्फुरणेनैव रजोलेखामिवानिलः ॥ १५ ॥ शिखिध्वज उवाच । स वृक्षोटजवीरुत्काद्वासना स्वाश्रमादपि । परित्यक्ता मया नूनं सर्वत्यागः स्थितो मम ॥ १६ ॥ कुम्भ उवाच । वृक्षो वापी स्थलं गुल्ममुटजं व्रततीवृतिः । इति किंचिन्न ते सर्वं सर्वत्यागः कुतस्तव ॥ १७ ॥ तवास्त्यन्योऽपरित्यक्तः सर्वस्माद्भाग उत्तमः । तं परित्यज्य निःशेषं परामायास्यशोकताम् ॥ १८ ॥ शिखिध्वज उवाच । एतच्चेन्मम नो सर्वं तत्सर्वं भाजनादि मे । चर्मकुड्यकुटीरादि तत्तावत्संत्यजाम्यहम् ॥ १९ ॥ श्रीवसिष्ठ उवाच । इत्युक्त्वा स समुत्तस्थावविक्षुब्धमतिः शमी । विष्टरादवदातात्मा श्रृङ्गादिव शरद्धनः ॥ २० ॥

हिन्दी अर्थ

महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, ऐसा कहते हुए कुम्भवाक्य से प्रबोधित जितेन्द्रिय वीर राजा शिखिध्वज ने निमेषभर ध्यान करके हृदय में स्फुरित हो रही उस आश्रम की अपनी ममता को शुद्ध संवित्‌ से उस प्रकार धो डाला, जिस प्रकार पवन स्फुरणमात्र से धूलिलेखा को धो डालता है । राजा शिखिध्वज ने कहा : हे प्रिय, वृक्ष, पर्णकुटी, लता आदि से सम्पन्न इस अपने आश्रम से भी अपनी ममता मेने छोड दी । अब तो मेरा सर्वत्याग सिद्ध हो गया न ? कुम्भ ने कहा : हे राजन्‌, वृक्ष, वापी, स्थल, गुल्म, पर्णकुटी और ये लताएँ - ये सब तो आपके कुछ भी नहीं हैं, फिर आपका सर्वत्याग कैसे सिद्ध हुआ | सबसे उत्तम भाग का तो अभी आपने त्याग ही नहीं किया है, उसका पूर्णरूप से परित्यागकर आप उत्कृष्ट अशोकता को प्राप्त होगे । राजा शिखिध्वज ने कहा : हे प्रिय, यदि ये सब मेरे नहीं हैं, तो पात्र आदि तथा मृगचर्म, दीवार, कुटीर आदि तो मेरे सब हैं, इन्हींको पहले छोडता हूँ। महाराज वसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, यह कहकर अविक्षुब्धमति, शमी तथा शुद्धात्मा वह राजा शिखिध्वज अपने आसन से उस तरह उठ गया, जिस तरह पर्वत के श्रंग से शरत्‌कालीन मेघ