Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 92, Verses 29–31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 92, verses 29–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 29-31
संस्कृत श्लोक
कल्पान्ताग्नाविव व्योम तारालीं पवनोऽमलाम् ।
मया नरमृगेण त्वं चिरं वनमृगाच्च्युतम् ॥ २९ ॥
अबोधेन धृतं वृस्यामिदमेव मृगाजिनम् ।
इदानीं गच्छ तुच्छाय पन्थानः सन्तु ते शिवाः ॥ ३० ॥
वह्निना व्योमतां गच्छ सतारं व्योम ते समम् ।
तद्वृस्यङ्गात्कराभ्यां स धृत्वा चर्माजहाविति ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
हे मृगचर्म, मनुष्यरूपी
मृग मैने जंगली मृग से प्राप्त हुए तुम्हें बहुत दिनों तक अपने अज्ञान से इस कुशासन के ऊपर बिछाया,
(७) नक्षत्रमाला की उपमा से मालुम पड़ता है कि यह अक्षमाला स्फटिक की थी ।
अब यही तुम्हारा उपकार मेरे जीवन में सदा के लिए बना रहे । अब तुम अपने मूलकारण माया स्वभाव
के लिए चले जाओ, तुम्हारे अवान्तर कारणप्रविलयस्वरूप मार्ग तुम्हें कल्याणदायक हों । तुम सफेद
बिन्दुओं से चित्रित हो, अतः अग्नि के रास्ते तुम आकाशस्वरूप में मिल जाओ, यह आकाश भी तुम्हारे
ही सदृश सफेद चमकीले तारों से चित्रित है, यह कहकर उस राजाने कुशासन से उस मृगचर्म को
खींचकर अपने दोनों हाथों से अग्नि में उस तरह छोड़ दिया, जिस तरह प्रलयकालीन वायु पर्वतों को
समुद्र से खींचकर दावाग्नि में छोड़ देता हे