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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 92, Verse 4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 92, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

शिखिध्वज उवाच । राज्यं त्यक्तं गृहं त्यक्तं देशस्त्यक्तस्तथाविधः । दारास्त्यक्तास्तथाप्यङ्ग सर्वत्यागो न किं कृतः ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

सिद्धः सर्वपरित्यागः साधो संसाध्यतस्तव । खर्वीकृतजगदृभूतिर्विद्यास्वात्मोदयस्तथा ॥ (हे साधो, साधना कर रहे आपका वह सर्वपरित्याग सिद्ध हो चुका, जो जगत्‌ के प्रसिद्ध हिरण्यगर्भपद तक के ऐश्वर्यों को भी तुच्छ कर देनेवाला तथा विद्यारूपी निरतिशयानन्द आत्मज्ञान को उत्पन्न करनेवाला है ।) इत्यादि से तो आपने ही कहा था कि राज्यादि के परित्यागमात्र से आपका सर्वत्याग सिद्ध हो चुका ओर जिस राज्य आदि का परित्याग कर दिया है उसका फिर मैने स्वीकार भी नहीं किया, ऐसी स्थिति में आप बतलाइये कि मैंने सर्वत्याग का पूर्णरूप से अवलम्बन क्यो नहीं किया ? यों राजा शिखिध्वज पूछते हैं । हे प्रिय, यद्यपि राज्य छोड़ा, घरबार छोड़ा, उसी प्रकार सारा देश छोड़ दिया, स्त्री भी छोड़ दी, तथापि आप कहते हैं कि आपने सर्वपरित्याग नहीं किया, यह क्यों ?