Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 92, Verses 7–12
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 92, verses 7–12 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 7-12
संस्कृत श्लोक
शिखिध्वज उवाच ।
राज्यं चेन्मम नो सर्वं तत्सर्वं वनमेव मे ।
शैलवृक्षादिगुल्माढ्यं तदप्येतत्त्यजाम्यहम् ॥ ७ ॥
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
इति राम वदन्नेव कुम्भवाक्यप्रणोदितः ।
निमेषान्तरमात्रेण वशी वीरः शिखिध्वजः ॥ ८ ॥
प्रममार्ज वनास्थां तां कृतः सुदृढनिश्चयः ।
प्रावृडोघस्तटगतां रजोलेखामिवात्मना ॥ ९ ॥
शिखिध्वज उवाच ।
सवृक्षाद्रिवनश्वभ्राद्विपिनादपि वासना ।
परित्यक्ता मया नूनं परित्यागः स्थितो मम ॥ १० ॥
कुम्भ उवाच ।
अद्रेस्तटं वनं श्वभ्रं सलिलं पादपस्थलम् ।
इत्यादि तव नो सर्वं सर्वत्यागः कथं तव ॥ ११ ॥
तवास्त्येवापरित्यक्तः सर्वस्माद्भाग उत्तमः ।
तं परित्यज्य निःशेषं परामायास्यशोकताम् ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
कथित आशय को न जानकर राजा शिखिध्वज चूडाला का यह आशय समझ रहे हैं कि मैने पहले
राज्य आदि का त्याग कर दिया है, इसलिए इस समय राज्यादि का सम्बन्ध न होने से वे त्याग के पात्र हैं
ही नहीं ओर पर्वत, वृक्ष आदि का इस समय सम्बन्ध होने के कारण उनके त्याग के बिना सर्वत्याग की
सिद्धि नहीं हो सकती, यह कहते है ।
राजा शिखिध्वज ने कहा : यदि आप मानते हैं कि मेरा राज्य सब कुछ नहीं है तो यह पर्वत, वृक्ष,
गुल्म आदि से भरपूर वन ही मेरा इस समय सब कुछ है, इसलिए इसका मैं त्याग करता हू । महाराज
वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, कुम्भ के वाक्य से प्रेरित होकर उस तरह कह रहे वीर जितेन्द्रिय
शिखिध्वज ने दूसरे ही निमेष में उस वनासक्ति को ऐसे धो डाला, जैसे वर्षा का प्रवाह तटगत धूलिलेखा
को, क्योकि ऐसा करने के लिए उसने दृढ़ निश्चय कर लिया था । राजा शिखिध्वज ने कहा : हे प्रिय,
अनेक जंगली वृक्षो, पर्वतो ओर गड्ढों से युक्त जंगल से भी मैंने अपनी वासना का (ममता का) परित्याग
कर दिया, अब तो मेरा सर्वत्याग सम्पन्न है न ? कुम्भ ने कहा : हे राजन्, यह पर्वत का तट, वन, वापी
(बाउली), गुल्म और वृक्षों के नीचे की सुन्दर भूमि - ये सब तो आपके हैं ही नहीं, फिर आपका
सर्वत्याग कैसे सम्पन्न हुआ। हे राजन्, सबसे उत्तम भाग का तो आपने अभी परित्याग ही नहीं किया हे,
उसका आप भलीर्भोति त्याग करके उत्कृष्ट अशोकता को प्राप्त होगे