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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 92, Verse 3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 92, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 92 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

अथ चेद्वचनं तस्यास्त्वया नानुष्ठितं नृप । तत्सर्वसंपरित्यागः कस्मान्न निपुणीकृतः ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

आत्मबुद्धबा चिरं जीवेद्‌ गुखुबुद्धया विशेषतः । पर बुद्धिर्विनाशाय स्त्रीबुद्धिः प्रलयंकरी ॥ इस वचन के अनुसार स्त्रीबुद्धि की उपेक्षाकर अपनी बुद्धि से निश्चित सर्वत्याग को ही यदि आपने महत्त्वपूर्ण समझा, तो फिर आपने उसीको स्थिर क्यो नहीं किया ? हे नृप, यदि आपने उस चूडाला के कथन का पालन नहीं किया, तो फिर सर्वत्याग का ही पूर्णरूप से आश्रय क्यों नहीं लिया ?