Guru's AddaGuru's Adda

Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 40

उनतालीसवाँ सर्ग समाप्त चालीसवाँ सर्ग पूज्य, पूजक एवं पूजा आदि विकल्पों से शून्य, शिवस्वरूप, शुद्ध पूर्ण चिदात्मा ही देवताओं में सार है यह वर्णन ।

14 verse-groups

  1. Verse 1आत्मज्ञानी द्वारा विहित ओर अविहित सभी प्रकार के कर्म शिवार्चनरूप ही हैं, यह कहते है। ईश्व…
  2. Verse 2किस कारण यह आत्मा का पूजन होता है ? इस पर कहते हैं। उस प्रकार के पूजन से ही आत्मा अपने पा…
  3. Verse 3सभी स्वाभाविक चेष्टाएँ राग-द्वेष की मूल होने के कारण अनर्थ की हेतु हैं, फिर वे आत्म-पूजनर…
  4. Verse 4महर्षे, अपने ओर पराये सम्पत्ति, दरिद्रता (दीनता), सुख, दुःख, भूख, प्यास आदि का जो-जो वेदन…
  5. Verse 5ऐसी स्थिति में आकाश आदि स्वरूप एवं जाग्रत्‌ आदि स्वरूप विश्व का जो अध्यारोप है, वही शिवस्…
  6. Verse 6शिव, शान्त, अन्य से प्रकाशित न होनेवाला स्वप्रकाश ब्रह्मरूप या प्रत्यगात्मरूप आत्मा ही मा…
  7. Verse 7अत्यंत आश्चर्य है कि प्रत्यगात्मा ही अपने भीतर का मानों अपना वास्तव स्वरूप भूलकर ओर जीव आ…
  8. Verse 8यों तात्विक विवार करने पर पूज्य, पूजक आदि सभी त्रिपुटियाँ बाधित हो जाती हैं, यह कहते है ।…
  9. Verse 9ब्रह्मन्‌, जिस परिच्छिन्न आकारवाली मूर्ति में पूज्य, पूजा आदि त्रिपुटी -क्रम की कल्पना की…
  10. Verse 10महर्षे, जो देव पूज्य, पूजा आदि त्रिपुटी से युक्त हे, वह सदा निर्मलस्वरूप, समस्त शक्तियों…
  11. Verse 11हे ब्रह्मन्‌, तीनों जगत्‌ में फैले हुए स्वच्छातिस्वच्छ संविद्रूपी आत्मलक्षण ईश्वर की आकृत…
  12. Verse 12हे विद्वान, जिन विद्वानों के मत में देश, काल आदि से परिच्छिन्न ईश्वर माना जाता हे, वे हम…
  13. Verses 13–14इसलिए उनकी परिच्छिन्न दृष्टि का परित्याग कर ओर अपनी इस अपरिच्छिन्न दुष्टि का अवलम्बन कर स…
  14. Verse 15हे मुने, जहाँ सब अंगों में स्फटिक शिलाएँ जडी गई हैं तथा पास में चारों ओर नील, रक्त आदि दू…