Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 40, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 40, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 40 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
रागद्वेषादिशब्दार्थानात्मन्यन्यतयामले ।
संभवन्ति पृथग्रूपावह्नौ वह्निकणा इव ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
सभी स्वाभाविक चेष्टाएँ राग-द्वेष की मूल होने के कारण अनर्थ की हेतु हैं, फिर वे आत्म-पूजनरूप
कैसे होगी ? इस शंका पर आत्मा से पृथक् रागद्वेष आदि विकारों को न देखने से ही उक्त चेष्टाएँ
आत्मपूजनरूप है, यह कहते है ।
निर्मल आत्मा में राग, द्वेष आदि शब्द और उनके अर्थ आत्मा से अन्य होकर पृथक्-रूप से उस
प्रकार नहीं रह सकते, जिस प्रकार अग्नि मेँ अग्निकण