Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 40, Verses 13–14
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 40, verses 13–14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 40 · श्लोक 13,14
संस्कृत श्लोक
तदीयां दृष्टिमुत्सृज्य तथेमामवलम्ब्य च ।
समः स्वच्छमनाः शान्तो वीतरागो निरामयः ॥ १३ ॥
कामोपहारैरभितो यथाप्राप्तैरखिन्नधीः ।
आत्मानमर्चयंस्तिष्ठ सुखदुःखशुभाशुभैः ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए उनकी
परिच्छिन्न दृष्टि का परित्याग कर ओर अपनी इस अपरिच्छिन्न दुष्टि का अवलम्बन कर सम, निर्मल
मन, शान्त, रागशून्य, स्वस्थ और खेदशून्य बुद्धियुक्त होकर तुम विधिवश प्राप्त हुए सुख, दुःख,
शुभ, अशुभ आदि कामोपभोग से आत्मदेव की पूजा करते हुए स्थित रहो