Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 40, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 40, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 40 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
विश्वसंवित्तिरेवार्चा नित्यस्यात्मन एव च ।
घटाद्यात्मतया ब्रह्म स्वयमात्मा तथैव च ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
ऐसी स्थिति में आकाश
आदि स्वरूप एवं जाग्रत् आदि स्वरूप विश्व का जो अध्यारोप है, वही शिवस्वरूप आत्मा तथा प्रत्यगात्मा
का पूजन है, (यह सिद्ध हुआ । क्योकि) जिस प्रकार आकाशादि-क्रम से घटरूप होकर ब्रह्म उससे
अलंकृत होता है, ठीक उसी प्रकार स्वयं प्रत्यगात्मा भी जाग्रत् आदि क्रम से घटादिस्वरूप होकर उससे
अलंकृत होता हे