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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 4

तीसरा सर्ग समाप्त चौथा सर्म अन्य बाह्य दुष्टियोँ का निरास कर तथा आत्मदृष्टि मे सुस्थिर बनाकर श्रीरामचन्द्रजी से महाराज वसिष्ठजी का संशयनिवृत्त्यर्थ पूछना, यह वर्णन |

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  1. Verse 1श्रीरामचन्द्रजी की प्रत्यग्‌-दुष्टि का उदघाटन करनेवाले महर्षिं वस्रिष्ठहजी पहले आध्यात्मि…
  2. Verse 2उसमे युक्ति बतलाते हैं। श्रीरामजी, एकमात्र महात्मा आत्मा ने ही अपनी सत्ता के संसगध्यास से…
  3. Verse 3मन आदि में अनुगत प्रत्यकृ-तत््व के एकमात्र अपरोक्ष साक्षात्कार से ही उसमें विश्रान्ति लेन…
  4. Verse 4भली प्रकार विचारित अध्यात्मशास्त्ररूपी मंत्र से तृष्णारूपी महामारी ऐसे क्षीण हो जाती है,…
  5. Verse 5श्रीरामजी, जैसे आकाश में मेघ के शांत हो जाने पर शेत्य अनायास नष्ट हो जाता हे, वैसे ही मूर…
  6. Verse 6हे पापरहित श्रीरामजी, जैसे सूत्र के टूट जाने पर हार के मोतियों का सन्निवेश नष्ट हो जाता ह…
  7. Verse 7इस प्रकार समस्त वेदान्त शास्त्र के रहस्यभूत आत्मदरष्टि का उद्घाटन कर अव उससे विपरीत शास्त…
  8. Verse 8उस दुर्बुदि का, जिसका आगे के व्यवहित सर्ग मेँ निरूपण होनेवाला है, प्रतीक द्वारा उदाहरण दे…
  9. Verse 9अव दर्शित प्रत्यगात्मदृष्टि में हेतुओं से श्रीरामचन्द्रजी की स्थिरता ताडकर महर्षि वसिष्ठज…
  10. Verse 10हे रघुकुल के दीपक, अबमैं यह मानता हू किं आप मेरे वचनो से अज्ञाननिद्रा का त्यागकर आत्मज्ञा…
  11. Verse 11अव अपने उपदेश की सफलता देखकर महर्षि श्रीरामजी की और अपनी प्रशंसा करते हुए कहते है । हे भद…
  12. Verse 12श्रीरामजी, चूँकि आपने अपनी बुद्धि से मुञ्जमें उपादेय वाक्यता ओर आप्ततमता (भ्रेष्ठतमता) का…
  13. Verse 13अब महाराज वस्निष्ठजी स्वकीय कुलपूज्यत्व और माननीय शासनत्व की प्रसिद्धि करते हुए फल में पर…