Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 4, Verse 9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 4, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
स्थिरतामुपयातोऽसि भावाभावविवर्जितः ।
पदे परमविस्तारे नभसीव प्रभञ्जनः ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
अव दर्शित प्रत्यगात्मदृष्टि में हेतुओं से श्रीरामचन्द्रजी की स्थिरता ताडकर महर्षि वसिष्ठजी
कहते है ।
भद्र, जैसे विस्तृत आकाश में प्रभंजन वायु स्थिरता प्राप्त किये रहता है, वैसे ही आप भाव-अभाव
की कल्पनाओं से निर्मुक्त होकर अत्यन्त परम पद में स्थिरता प्राप्त किये हुए हैं