Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 4, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 4, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
सामान्ये च लगन्त्येव जने कुलगुरोर्गिरः ।
अत्युदारमतौ राम न लगन्ति कथं त्वयि ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
अव अपने उपदेश की सफलता देखकर महर्षि श्रीरामजी की और अपनी प्रशंसा करते हुए
कहते है ।
हे भद्र, जनसाधारण मनुष्यों में भी अपने कुलगुरू के वचन लग जाते हैं यानी ज्ञान पैदा कर देते हैं,
तब आपके सदृश उदार (विशाल) बुद्धिवाले मनुष्यों में वे क्यों न लगें यानी उनसे प्रतिपादित अर्थ का
ज्ञान क्यो न हो जाय ?