Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 4, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 4, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
मनो बुद्धिरहंकार इन्द्रियादि तथानघ ।
अचेत्यचिन्मयं सर्वं क्व ते जीवादयः स्थिताः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी की प्रत्यग्-दुष्टि का उदघाटन करनेवाले महर्षिं वस्रिष्ठहजी पहले आध्यात्मिक
मन आदि पदार्थो मे अनुगत, अखण्ड अद्वैत चैतन्य को दिखलाते हुए जीव आदि भेद के बाध का
अनुभव कराते हैँ ।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे पापशून्य श्रीरामजी, मन, बुद्धि, अहंकार तथा इन्द्रिय आदि सब
कुछ विषयशून्य एकमात्र चित्स्वरूप ही है, ऐसी स्थिति में आपके जीव आदि कहाँ रहेंगे ?
सर्ग सन्दर्भ
तीसरा सर्ग समाप्त चौथा सर्म अन्य बाह्य दुष्टियोँ का निरास कर तथा आत्मदृष्टि मे सुस्थिर बनाकर श्रीरामचन्द्रजी से महाराज वसिष्ठजी का संशयनिवृत्त्यर्थ पूछना, यह वर्णन |