Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 4, Verse 13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 4, verse 13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
वयमिह हि महानुभाव नित्यं कुलगुरवो भवतां रघूद्वहानाम् ।
मदुदितमिदमाशु धार्यमार्य शुभवचनं हृदि हारवत्त्वयेति ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
अब महाराज वस्निष्ठजी स्वकीय कुलपूज्यत्व और माननीय शासनत्व की प्रसिद्धि करते हुए फल
में पर्यवसित अपने उपदिष्ट अर्थ का स्मरणमुख से धारण करना चाहिए, यों श्रीरामभद्र के प्रति
विधान करते हैं।
हे महानुभाव श्रीरामजी चूँकि मैं रघुकुल के श्रेष्ठ पुरुष आप लोगों का सदा से कुलगुरु हूँ,
इसलिए आपको मेरे द्वारा कहे गये शुभ वचनों को बारबार दृढ़ निश्चय कर हृदय में, हार की नाई,
धारण करना चाहिए