Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 4, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 4, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
भोगतृष्णाविषावेशो यदैवोपशमं गतः ।
तदैवमस्तमज्ञानमान्ध्यं ध्वान्तक्षयादिव ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
मन आदि में अनुगत प्रत्यकृ-तत््व के एकमात्र अपरोक्ष साक्षात्कार से ही उसमें विश्रान्ति लेनेवाले
महात्मा की बाल्यार्थ-भोग की तृष्णा चूर-चूर हो जाती है, तृष्णा के चूर हो जाने पर सम्पूर्ण बाह्य
वस्तुओं में अनुगत सन्मात्र का भी प्रत्यगात्मा के अभेदरूप से स्वतः ही भान होने के कारण बाह्यअध्यास
के हेतुभूत अज्ञान भी नष्ट हो जाता है, इस आशय से कहते है।
भद्र, उस प्रकार प्रत्यगात्मा के साक्षात्कार से जब भोग-तृष्णारूपी विष का आवेश विनष्ट हो
जाता है, तब अज्ञान उस प्रकार नष्ट हो जाता है, जिस प्रकार अन्धकार के नष्ट हो जाने पर चक्षु की
अन्धता (विषयप्रकाशन में असामर्थ्य) नष्ट हो जाती हे