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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 4, Verse 7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 4, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 4 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

रघुनाथ विघाताय शास्त्रार्थं भावयन्ति ये । कृमिकीटत्वयोग्याय चेतसा संमिलन्ति ते ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

इस प्रकार समस्त वेदान्त शास्त्र के रहस्यभूत आत्मदरष्टि का उद्घाटन कर अव उससे विपरीत शास्त्रार्थ के विघातक दर्शन की निन्दा करते हैं। हे श्रीरामजी, मेरे द्वारा बतलाये ये उपर्युक्त शास्त्रीय रहस्य की उपेक्षाकर जो पुरुष उसके विनाश के लिए विपरीतरूप से भावना करते हैं, वे कृमि, कीट आदि रूपता के हेतुभूत पाप के लिए राग आदि दोषों की उत्पादक बुद्धि के साथ अपना सम्बन्ध करते हैं - ऐसा समझना चाहिए