Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 70
अइसठ्वौँ सर्ग समाप्त उनहत्तरवाँ सर्ग सम्पूर्ण अर्थो में आसक्ति के त्याग से मन चिन्मात्रस्वरूप मेँ सुस्थिर तथा चिन्मात्रशेष जिस क्रम से हो जाता है, उस क्रम का कथन।
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- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे रामचन्द्रजी, विवेकी विद्वान् पुरुष भले ही सर्वदा तत् तत् समय…
- Verse 2न साध्य पदार्थों की चेष्टाओं में, न अतीत काल की वस्तुओं की चिन्ताओं में, न वर्तमान कालीन…
- Verse 3न आधिभौतिक भार्या, चाकर आदि विषयों में, न उनके उपभोग की इन्द्रियवृत्तियों मे, न आध्यात्मि…
- Verse 4न भौंहों के बीच में, न नासिका के मध्य में, न मुख में, न दक्षिण नेत्र की कनीनिका में, न अन…
- Verse 5न जाग्रत् में, न स्वप्न में, न सुषुप्ति में, न शुद्ध सत्वगुण में, न तमोगुण में न पीतरक्त…
- Verse 6न कार्य वर्ग में, न स्थिरकारण अव्यक्त में, न सृष्टि के आदि कालमें, न मध्य काल में, न अन्त…
- Verse 7न रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द में; न विषयाभिलाषा की परवशतारूपी मोह में, न विषयोपभोग-फलर…
- Verse 8निश्चल बुद्धि की साक्षिभूता चिति में केवल विश्रान्ति कर परिपूर्णं भूमानन्द से युक्त अतएव…
- Verse 9इव“ शब्द से यह दिखलाया कि मन की इस प्रकार की स्थिति भी मिथ्या ही है। उस प्रकार चिति में व…
- Verse 10जैसे आकाश मेघो के साथ तनिक भी सम्बन्ध प्राप्त नहीं करता वैसे ही अपने स्वरूप मेँ निरत जीव,…
- Verse 11अथवा पूर्वोक्त सात्विक बुद्धि का भी परित्याग कर निर्विकार चित्-स्वरूप जीव अपने स्वरूप मे…
- Verses 12–33हे रामचन्द्रजी, जिसने अपने स्वरूप में परम विश्रान्ति प्राप्त कर ली है, जिसका अन्तःकरण आत्…