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Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 60

उनसठवाँ सर्ग समाप्त साठवाँ सर्ग जीवन्मुक्त उस सुरघु के देह विनाशपर्यन्त असंगरूप से आचरण तथा देह विनाश के बाद आकाश के समान अवस्थान का वर्णन |

10 verse-groups

  1. Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : भद्र श्रीरामजी, जैसे विश्वामित्र ने अपने तपोबल से ब्रह्मत्व प्राप्त…
  2. Verse 2पुनः पुनः दिवस मालाओं का निर्माण करनेवाले भगवान्‌ सूर्य की नाई वह राजा बार-बार धर्म, अर्थ…
  3. Verse 3तभी से लेकर वह राजा चिन्ता ज्वर से मुक्त होकर अपने राजोचित निग्रह ओर अनुग्रहरूपी कार्यो म…
  4. Verse 4हर्ष ओर विषाद रहित होकर प्रतिदिन अपने आय, व्यय आदि कार्यो को करते हुए उस उदार और गम्भीर आ…
  5. Verses 5–7जैसे प्रकाशमयी कम्पनशून्य अपनी शिखा से दीपक अत्यन्त शोभित होता है, वैसे ही वह राजा रुषुप्…
  6. Verses 8–9चूँकि यह सब जगत्‌ केवल चित्तत्व की कलना ही है, यों निश्चय करने के कारण उसकी बुद्धि भौतिक…
  7. Verse 10कमल की भाँति जिसके नेत्र थे ओर जिसके शरीर में तनिक भी वार्धक्यादि का विकार प्राप्त नहीं ह…
  8. Verse 11उसके बाद जैसे बरफ का कण गर्मी से शोषित होकर स्वकीय मूर्तस्वरूपका अपने आप परित्याग कर देता…
  9. Verse 12जैसे नदियों का जल दो किनारों से पार होते ही पानी परिच्छिन्नता का परित्याग कर परिपूर्ण यान…
  10. Verse 13उस परम पद में प्रवेश कर सुरघु किस प्रकार का हुआ, इसे कहते हैं। जैसे घटाकाश घट के फूट जाने…