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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 60, Verses 5–7

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 60, verses 5–7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 60 · श्लोक 5-7

संस्कृत श्लोक

सुषुप्तपदधर्मिण्या चित्तवृत्त्या व्यराजत । निष्कम्पया प्रकाशिन्या दीपः स्वशिखयेव सः ॥ ५ ॥ न निर्घृणो दयावान्नो न द्वन्द्वी नाथ मत्सरी । न सुधीर्नासुधीर्नार्थी नानर्थी स बभूव ह ॥ ६ ॥ समदर्शनया नित्यं वृत्त्याऽचापलधीरया । अन्तःशीतलया रेजे परिपूर्णार्णवेन्दुवत् ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे प्रकाशमयी कम्पनशून्य अपनी शिखा से दीपक अत्यन्त शोभित होता है, वैसे ही वह राजा रुषुप्तिके समान निश्चल प्रकाश-मयी चित्तवृत्ति से अत्यन्त शोभित होता था। वह न निर्दयी था, न दयालु था, न इन्द्वों से युक्त था, न मत्सरवाला था, न बुद्धिमान्‌ था, न बुद्धिरहित था, न अर्थी था ओर न अनर्थी था। भीतर शान्ति पर्हैवानेवाली तथा निश्चलता के कारण अत्यन्त धीर समदर्शनात्मक वृत्ति से वह ऐसे शोभित होता था, जैसे परिपूर्णं समुद्र ओर चन्द्रमा शोभित होते है