Upashama Prakarana (Dissolution) · Sarga 4
तीसरा सर्ग समाप्त चौथा सर्ग राजा दशरथजी का श्रीवसिष्ठजी के वाक्यों की प्रशंसा करना तथा श्रीवसिष्ठजी के वचन से श्रीरामचन्द्रजी द्वारा चिन्तित पदार्थो का अनुवाद |
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- Verse 1श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : वत्स, राजा दशरथ ने मेघ के गर्जन के तुल्य गंभीर वाणी से यह उनके उप…
- Verses 2–4भगवन्, कल की उपदेश कथावली से उत्पन्न हुए तथा तपस्या के क्लेश से भी बढ़े-चढ़े श्रम से आप…
- Verse 5अब चन्द्रमा की किरणों से भी महात्माओं की उपदेशवाणियाँ उत्कृष्ट हैं, ऐसा कहते हैँ । मनुष्य…
- Verse 6आत्मरूप रत्न के प्रकाशन में एकमात्र दीपकरूप तथा सरस युक्तिरूपी लताएँ जिससे उदित होती है,…
- Verse 7जैसे चन्द्रमा की किरणें अन्धकारराशि को हटा देती हैं वैसे ही सज्जनों की सूक्तियाँ मन से जो…
- Verses 8–10हे मुनिजी, जैसे शरत्काल में वर्षा ऋतु के मेघ क्षीण होने लगते हैं वैसे ही हम लोगों के संसा…
- Verses 11–13सिद्ध रस से बनाये गये सिद्ध अंजन से जिन्हे दृष्टि प्राप्त हो गई, ऐसे जन्मान्ध लोग जिस प्र…
- Verse 14राजा के यों कहने पर श्रीरामचन्द्रजी के सामने बैठे हुए, उदारबुद्धि भगवान श्रीवसिष्ठमुनि ने…
- Verses 15–17श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, हे अपने रघुकुल के एकमात्र प्रकाशक चन्द्र, हे मह…
- Verses 18–20हे सज्जनशिरोमणे, हे साधुवादों के एकमात्र भाजन, सर्वशक्तिसम्पन्न ब्रह्म से ही जैसे यह विश्…
- Verse 21हे सन्मते, फैले हुए अविद्या के रूप का, जो काल के बल से नष्ट होनेवाला, संख्या से अनन्त और…
- Verse 22हे श्रीरामचन्द्रजी, बार-बार विचारा हुआ, मनन द्वारा हृदय में स्थापित तत्त्वचिन्तन मोक्षरूप…
- Verse 23हे श्रीरामचन्द्रजी, जैसे विशाल वक्षःस्थलवाला पुरुष कण्ठ में जातिशुद्धि से शोभित होनेवाले…
- Verse 24श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : ब्रह्माजी के पुत्र महातेजस्वी श्रीवसिष्ठजी के इस प्रकार श्रीरामचन…
- Verses 25–27श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे भगवन्, हे सब धर्मो के ज्ञाता, आपके ही प्रभाव का यह विस्तार ह…
- Verse 28हे उदारचरित, मनोहर, पुण्यमय और क्रमयुक्त वह सारा का सारा अतीत उपदेश सिलसिलेवार गुँथे हुए…
- Verses 29–32सब अनिष्टं की निवृत्ति करनेवाला, अत्यन्त मधुर, परमपुरुषार्थ का साधन ओर अनुल्लंघनीय होने क…
- Verse 33अब तीर्थूप होने के कारण महानदरूप से गुरु का सम्बोधन कर अवशिष्ट उपदेश कहने के लिए प्रार्थन…