Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 4, Verses 18–20
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 4, verses 18–20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
उपशम प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
यथेदमुदितं विश्वं विश्वेशादेव चेश्वरात् ।
कच्चित्स्मरसि तत्साधो साधुवादैकभाजन ॥ १८ ॥
रूपं कच्चिदविद्याया बलाद्भङ्गुरमाततम् ।
अनन्तमन्तवच्चैव सम्यक्स्मरसि सन्मते ॥ १९ ॥
चित्तमेव नरो नान्यदिति यत्प्रतिपादितम् ।
लक्षणादिविचारेण कच्चित्स्मरसि साधु तत् ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
हे सज्जनशिरोमणे, हे साधुवादों के एकमात्र भाजन, सर्वशक्तिसम्पन्न ब्रह्म से ही
जैसे यह विश्व उदित हुआ है, उसका क्या आप स्मरण करते हैं ?