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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 4, Verses 8–10

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 4, verses 8–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

उपशम प्रकरण · सर्ग 4 · श्लोक 8-10

संस्कृत श्लोक

तृष्णालोभादयोऽस्माकं संसारनिगडा मुने । तवोक्त्या तनुतां याताः शरदीवासिताम्बुदाः ॥ ८ ॥ संप्रवृत्ता वयं द्रष्टुमात्मानमपकल्मषम् । रसाञ्जनानीतदृशो जात्यन्धा इव काञ्चनम् ॥ ९ ॥ संसारवासनानाम्नी मिहिका हृदयाम्बरे । प्रवृत्ता तनुतां गन्तुं त्वदुक्तिशरदेव नः ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

हे मुनिजी, जैसे शरत्काल में वर्षा ऋतु के मेघ क्षीण होने लगते हैं वैसे ही हम लोगों के संसार में बन्धन श्रृंखलारूप तृष्णा, लोभ आदि आपके उपदेश वचन से क्षीण होने लग गये हैं